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Vivah-Sukta - 'विवाह-सूक्त': भारतीय संस्कृति में विवाह संस्कार का अद्वितीय विवेचन| डॉ. गुलाब कोठारी का नया प्रतिभात्मक कृति: पत्रिका पब्लिकेशन के जरिए"
Vivah-Sukta - 'विवाह-सूक्त': भारतीय संस्कृति में विवाह संस्कार का अद्वितीय विवेचन| डॉ. गुलाब कोठारी का नया प्रतिभात्मक कृति: पत्रिका पब्लिकेशन के जरिए"
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वेद में अनेक मंत्र गृहस्थ आश्रम में पति-पत्नी के कर्तव्यों पर प्रकाश डालते हैं। भारतीय दर्शन में विवाह संस्था को सृष्टि का मूल आधार भी माना है और प्रति सृष्टि (विलय या मोक्ष) का आधार भी माना है। सृष्टि युगल के सिद्धांत पर आगे बढ़ती है, अतः इसे ही जीवन की पूर्णता का दर्जा प्राप्त है। गृहस्थाश्रम सृष्टि विस्तार का काल है। जीवन की पूर्णता का मूल आधार ही विवाह को माना गया है। भारतीय दर्शन में संपूर्ण संवत्सर का एक अंग मानकर विवाह संस्कार का निरूपण किया गया है। विवाह-सूक्त (कर्पूर-भाष्य) में विवाह संस्था के संदर्भ में प्रबुद्ध चिंतक, संवेदनशील लेखक एवं प्रतिबद्ध पत्रकार, वैदिक वाङ्मय एवं भारतीय दर्शन के अध्येता गुलाब कोठारी ने गहन अध्ययन करके इसका वर्तमान परिप्रेक्ष्य में विवेचन किया है। Explore the spiritual and social significance of marriage through Vedic philosophy in Vivah Sukt by Dr. Gulab Kothari — a profound analysis of Indian traditions, grihastha ashram, and the sacred union of husband and wife.
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